गुरु और शिष्य का रिश्ता बहुत ही विलक्षण होता है। गुरु एक दीया जैसे होता है जो स्वयं चलता है फिर भी अपने चारों तरफ या अपने नीचे अंधेरा ही रखता है। दूसरों को प्रकाश दान करता है उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों के लिए अपने समाज के लिए अपने आपको तपाता है,अपने आप को जलाता है, ताकि उनके प्रकाश से समाज प्रकाशित हो सके वर्तमान समय में लोग गुरु को मानते हैं ना कि गुरु की जब आप गुरु की मानेंगे तब आप कभी सफल नहीं हो पाए लेकिन जब आप गुरु की मानेंगे तब निश्चित है की आपको सफल होने में कोई नहीं रोक सकता क्योंकि गुरु से बड़ा इस वसुंधरा पर कोई नहीं है। चाहे भगवान राम आए हो, चाहे भगवान कृष्ण, इस धरती पर आए हो सभी ने गुरु की मानी तभी वह अपना कर्तव्य निभा कर इस समाज की बुराइयों का विनाश किया।
आइए हम आपको एक उदाहरण से समझाते।
महाभारत में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू मुझे मत मान मेरी मान भगवान जो अर्जुन से कहते हैं वही अर्जुन करता है और युद्ध में विजय प्राप्त करता है लेकिन अगर अर्जुन श्री कृष्ण की ना मानता श्री कृष्ण को मानता तो कभी वह युद्ध मे विजय नहीं पाता क्योंकि युद्ध तो अर्जुन को ही करना था भगवान श्री कृष्ण तो उपदेश ही देते थे।
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