लोकतंत्र शुरू से ही एक आदर्श रूप में हम सबके सामने प्रस्तुत रहा है। और यदि अनंत काल से देखे तो इसकी संख्या एक बड़े ही विशिष्ट व व्यवस्थित क्रम में दी जाती रही हैं। वर्तमान समय में और भूतकाल में भी ऐसे बहुत से प्रश्न हमें मिले हैं जिनसे कहीं ना कहीं लोकतंत्र के नाम पर भी अब प्रश्नवाचक चिन्ह लगना उचित हो गया है क्योंकि लोकतंत्र कोई साधारण सी वस्तु नहीं है।
कोई साधारण सा शब्द नहीं है लोकतंत्र का आशय ही होता है लोगों का तंत्र एक ऐसा तंत्र जहां के लोग ही मिलकर उस तंत्र को बनाते हैं जहां का तंत्र इन लोगों के लिए ही बना हो जहां के लोग उस तंत्र का और वह स्वयं तंत्र लोगों का भरण पोषण करता हो तात्पर्य यह है कि लोकतंत्र में लोग स्वतंत्र होते हैं। अपनी भूमिकाओं को अदा करने के लिए, वही लोकतंत्र उन लोगों को उनकी भूमिकाओं को अदा करने के लिए सारे स्वतंत्रता और अधिकार उन्हें उपलब्ध कराता है जो उनकी भूमिका है यह होता है
वास्तव में आज लोकतंत्र के ऊपर प्रश्नवाचक चिन्ह इस कारण भी लग रहे हैं कि क्या लोकतंत्र के लोग भी उस तंत्र का गलत उपयोग करके उस तंत्र को धूमिल कर रहे हैं या उस लोकतंत्र के आर्मी लोग एक दूसरे पर छुप के वार कर रहे हैं या फिर वास्तव में लोकतंत्र की प्रक्रिया प्रणाली ही खराब हो चुकी है और इस से ध्वस्त कर दिया जाना चाहिए।
आएिन रोजाना ऐसे प्रसंग होते रहते हैं जो लोकतंत्र में अपने आप में प्रश्नवाचक चिन्ह लगा देते हैं अभी हाल में ही लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश का उदाहरण लेते हैं जहां पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता के बेटों द्वारा यह दशरथ किया गया है जिसमें निर्दोष किसानों को कार से रौंदकर मार दिया जाता है और अगर किसान उस चीज का विरोध करते हैं तो उल्टा किसानों को ही दोषी करार दिया जाता है कि आप लोगों ने पहले पत्थर बरसाए और फिर हमने आपको रौंद दिया।
बिल्कुल ही शोभा नहीं देता है जब आप एक ऐसे तंत्र में रहते हैं जहां का तंत्र आपके लिए बना हो और आप उस तंत्र के लिए बने हो और आप ही उस तंत्र के साथ खिलवाड़ कर रहे हो तंत्र के सहायता से लोगों पर हुकूमत कर रहे हैं। यह बिल्कुल ही शोभा नहीं देता है कि आप अपने आप को पूरे विश्व में लोकतंत्र का सबसे बड़ा स्थान और सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करते हैं और अपने लोकतंत्र का पूरे विश्व में लोहा मनवाते हैं और दूसरी तरफ आप ऐसे कृत्य करके उस लोकतंत्र उस देश की मर्यादा उस देश की अखंडता उस देश के लोगों के साथ उस देश के लोगों के भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं
वास्तव में आज लोकतंत्र का पूरी तरीके से स्वरूप बदल चुका है आज का लोकतंत्र लोगों की मदद से एक तंत्र तो खड़ा कर लेता है लेकिन तंत्र खड़ा हो जाने के बाद लोगों को भूल जाता है और उन पर हुकूमत की शादी रचने लगता है धीरे-धीरे या प्रक्रिया इतनी सादगी और सफाई से होती है कि अधिकांश लोगों को इसकी भनक भी नहीं हो पाती और जब तक वह इस बात को समझते हैं कि लोकतंत्र एक छलावा था वास्तव में इसके सामने तो दूसरी मुसीबत है
तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ऐसे समय में या तो वाह हताश हो जाते हैं या फिर उस चीज का विरोध कर सकते हैं या फिर थक हार कर उस चीज को उस वस्तु को स्वीकार कर लेते हैं आज अगर लोकतंत्र के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर करते हैं तो उन्हें तरह-तरह के अलंकारिक वर्णों से सुशोभित कर दिया जाता है जैसे देशद्रोही अखंडता को तोड़ने वाले देश में अराजकता फैलाने वाले और तमाम तरह की चीजें आपके नाम के साथ जोड़ दी जाती हैं।
और आपको एक हीन भावना से देखा जाने लगता है ऐसा तो कभी भी लोकतंत्र का स्वरूप नहीं था और ना ही किसी ने कल्पना की थी वास्तव में लोकतंत्र को बदला जाना चाहिए और इस पूरी प्रक्रिया में शुद्धिकरण की बहुत आवश्यकता है आजकल तंत्र पूरी तरीके से दूषित हो चुका है प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार और ऐसे भ्रष्ट नेता और ऐसे भ्रष्ट लोग शामिल हो गए जो लोगों की आंखों पर पट्टी बांध देते हैं और फिर उन पर हुकूमत करते हैं।
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