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- 85 एकड़ में बना देव संस्कृति विश्वविद्यालय उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार जिले में गंगा की गोद हिमालय की छाया सप्त ऋषि यों की तपोभूमि में बना विश्वविद्यालय अपने आप में एक कल्पवृक्ष है। भारत भूमि पर कभी तक्षशिला नालंदा एवं विक्रमशिला नाम के विश्वविद्यालय थे इसमें पूरे दुनिया से विद्यार्थी शिक्षा लेने आया करते थे उसी की परंपरा एवं संस्कृति को देव संस्कृति विश्वविद्यालय आज बनाए रखा है
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में ना केवल शिक्षा ही मिलती है बल्कि विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला जीवन प्रबंधन एवं गीता ध्यान के कक्षाओं के माध्यम से माध्यम से माननीय श्रद्धये कुलाधिपति डॉ प्रणव पंड्या जी के द्वारा समय-समय पर मिलती रहती है देव संस्कृति विश्वविद्यालय बच्चों को नौकरी ना देकर स्वयं एक नौकरी बनाकर यहां से भेजता है।
यहां के छात्र-छात्राएं भारत ही नहीं दुनिया के हर कोने में एक मिसाल के रूप में दूसरों को प्रकाश दे रहे हैं एक कहावत है की "नर्मदा नदी की कण कण में शंकर हैं" उसी प्रकार देव संस्कृति विश्वविद्यालय का "हर कड़ एक किताब है और हर व्यक्ति अपने आप में एक पुस्तकालय है"।
पूरे विश्व में देव संस्कृति विश्वविद्यालय एक ऐसा संस्थान है जो भारतीय संस्कृति भारतीय विरासत को आज पूरे विश्व में प्रसारित एवं विस्तृत कर रहा है। बचपन में मैं सुना करता था कि कोई कामधेनु गाय भी होती है जिसे जो मांगो वह मिल जाता है, लेकिन जब मैं देव संस्कृति विश्वविद्यालय आया यहां से परिचित हुआ तब मुझे पता चला कामधेनु से बढ़कर भी कुछ है तो वह है देव संस्कृति विश्वविद्यालय है ।
जिससे आप जो चाहोगे जितना चाहोगे आपको वह सब कुछ मिलेगा, देव संस्कृति विश्वविद्यालय में वह सब कुछ उपस्थित है जो मनुष्य की आवश्यकता है देव संस्कृति विश्वविद्यालय मानव को महामानव बनाने की टकसाल है।
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वैसे तो देव संस्कृति विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं है जो मुझे पसंद ना आया हो जिसने मुझे जीत ना लिया हो, लेकिन फिर भी देव संस्कृति विश्वविद्यालय का जो वातावरण है,यहां की जो शान्ति है, यहां का जो व्यवहार है, यहां पर जो भारतीय संस्कृति की पहचान है यज्ञ है।
और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मध्य स्थल में बना प्रग्येश्वर महाकाल जोकि देव संस्कृति विश्वविद्यालय का हृदय कहा जाता है।
हमें बहुत ही पसंद आया महाकाल पर जाकर बैठना,ध्यान करना, प्रातः यज्ञ करने के पश्चात महाकाल मंदिर पर जाकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करना, और जब किसी भी प्रकार की कोई भी परेशानी हो तो जाकर के महाकाल से विनती करना प्रार्थना करना,यह सब सच में बहुत ही मुझे पसंद आया।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय की हरियाली
देव संस्कृति विश्वविद्यालय की हरियाली जो वर्तमान में कुछ ही चुनें ऐसे संस्थान हैं जहां पर मिलती होगी क्योंकि हमारी नजरों में तो अभी तक ऐसा कोई विश्वविद्यालय नहीं मिला जहां पर देव संस्कृति विश्वविद्यालय जितना हरियाली यहां जितने पेड़ पौधे फूल है , यहां पर चिड़ियों की चहचहाती आवाजे ,भंवरों के गुनगुनाते गीत, सच में हर व्यक्ति के दिल को जीत लेते हैं।
This university deferent from other university.
देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं अन्य विश्वविद्यालय के बीच का अंतर देखा जाए तो जमीन और आसमान का है। बाहर के विश्वविद्यालयों में केवल साक्षरता ही मिलती है। जबकि देव संस्कृति विश्वविद्यालय में शिक्षा के साथ-साथ विद्या मिलती है जो जीवन जीना सिखाती है।
बाहर के विश्वविद्यालयों में अध्यापक एवं विद्यार्थी के बीच का संबंध केवल शिक्षा का ही होता है, जबकि देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक परिवार की तरह का संबंध रहता है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अध्यापक एवं विद्यार्थी साथ साथ रहते हैं जबकि बाहर के विश्वविद्यालय में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
कुलपति देव संस्कृति विश्वविद्यालय
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में हम हर वह उत्सव मनाते हैं जो विद्यार्थी को मनाना चाहिए जबकि बाहर के विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में कुलसचिव उपकुलपति कुलपति सर के माध्यम से जीवन प्रबंधन की क्लास चलती है जो जीवन को संवारने का कार्य करती है लेकिन बाहर के विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं है।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में हर सप्ताह हम कुलाधिपति आदरणीय श्रद्धये डॉ प्रणव पंड्या जी से गीता एवं ध्यान की कक्षाओं के माध्यम से अपने आप का विकास करते हैं,जबकि बाहर के विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति भारतीय परंपरा से हम परिचित ही नहीं होते उसे जीवन में उतारते हैं, जबकि बाहर के विश्वविद्यालयों में पाश्चात्य संस्कृति को लोग जी रहे हैं।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में सादा जीवन उच्च विचार से हम शिरोधार्य होते हैं, जबकि बाहर के विश्वविद्यालय में अनेक प्रकार के खर्चाओ के हम आदी हो जाते हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में हमें किसी भी प्रकार की परेशानी हो हम आराम से अपने कुलपति सर प्रति कुलपति सर से चर्चा कर लेते हैं। जबकि बाहर के विश्वविद्यालयों में इनके दर्शन भी नहीं होते हैं। इसीलिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय एक जीता जागता स्वर्ग है यह स्वयं में अपने आप में एक मंदिर और गिरजाघर गुरुद्वारा है
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देव संस्कृति विश्वविद्यालय पूरे विश्व में एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहां पर विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला सिखाई जाती है। यहां पर किसी प्रकार का कोई चुनाव नहीं होता है जिसे बच्चों को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़े। यहां पर अनावश्यक ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे अध्ययनरत विद्यार्थियों को कोई परेशानी हो यहां पर किसी प्रकार की कोई कोचिंग या अनावश्यक खर्चा नहीं होता है।
यहां सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा चलती है, देव संस्कृति विश्वविद्यालय ऐसा संस्थान है जहां पर पत्थर को भी काट कर भगवान का रूप दे दिया जाता है ऐसा ही विद्यार्थी के साथ होता है कैसा भी विद्यार्थी हो जब देव संस्कृति विश्वविद्यालय में आ जाता है तो अलग ही पहचान ले जाता है इसलिए मैंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था।
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एक कहावत है की जब लोहे को तलवार का रूप दिया जाता है तो सबसे पहले उससे गरम आग में तपाया जाता है, इसके बाद में अनगिनत हथौड़े उसके ऊपर पड़ते हैं फिर जाकर एक तलवार या अन्य कोई वस्तु का रूप लेता है उसी प्रकार देव संस्कृति विश्वविद्यालय में जब बच्चे आते हैं, तो उन्हें यहां के डिसिप्लिन यहां हमेशा उन्हें हर बात पर टोकना रात्रि में जल्दी सो जाना सुबह जल्दी सोकर जगना सारे क्लासेस अटेंड करना अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है वह बच्चे परेशान हो जाते हैं यह क्या है?
लेकिन भाई चमकने के लिए पहले तो तपना पड़ेगा देव संस्कृति विश्वविद्यालय के सभी अध्यापक वैसे ही हैं जैसे जब कुम्हार कोई मटका बनाता है तो मटके के अंदर हाथ रखकर बाहर से हथौड़े से वार करता है देखने वालों को लगता है कि इस मटके को पर अनगिनत है हथोड़े बरस रहे लेकिन उसे या नहीं मालूम कि उसी कुमार का दूसरा हाथ उस मटके के अंदर भी है उसी प्रकार देव संस्कृति विश्वविद्यालय के हर वह अध्यापक उस बच्चे को इतना निपुण करता है इतना मजबूत बना देता है कि वह किसी भी क्षेत्र में जाए। दुनिया के किसी भी कोने में जाए उसे कोई पछाड़ नहीं सकता है।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अगर दाखिला लेने के बात की जाए तो मैं तो हर उस छात्र से कहूंगा कि अगर तुम्हारी डिग्रियां पूरी हो गई हूं तो 6 महीने का सर्टिफिकेट का ही कोर्स करो लेकिन देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक बार अपने जीवन में दाखिला जरूर लो क्योंकि जब तक आप देव संस्कृति विश्वविद्यालय में अध्ययन नहीं करेंगे तब तक मुझे नहीं लगता कि आप अपने आप को पहचान पाएंगे कि आपके अंदर क्या पोटेंशियल है? आप क्या कर सकते हैं? देव संस्कृत विश्वविद्यालय को अगर 1 वाक्य में कहा जाए तो मनुष्य को मनुष्य से पहचानने का संस्थान देव संस्कृति विश्वविद्यालय है।
वैसे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के बारे में कुछ बोलना कुछ कहना हमारे बस की बात नहीं है वैसे ही जैसे एक गूंगे व्यक्ति को स्वादिष्ट पकवान खिला दिया जाए इसके बाद में उससे पूछ जाए इसका स्वाद क्या है तो वह स्वाध बता नहीं सकता और उसका अनुभव कर सकता है उसी प्रकार देव संस्कृति विश्वविद्यालय में जो भी व्यक्ति आता है जो भी छात्र आता है इसकी व्याख्या नहीं कर सकता वैसे ही जैसे समुद्र की गहराई नापी नहीं जा सकती आकाश की ऊंचाई नापी नहीं जा सकती उसी प्रकार देव संस्कृति विश्वविद्यालय की व्याख्या की नहीं जा सकती है।
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